Success Story

 


मचान बनाकर उन्नत कृषि

मचान बनाकर उन्नत कृषि
बालाघाट जिले के मदनपुर गांव में रहने वाली सरवन्ती तेकाम की आर्थिक स्थिति 2009 में परसवाड़ा नारी भक्ति तेजस्विनी महिला संघ से जुड़ने से पूर्व बेहद खराब थी। लेकिन समूह से जुड़ने के बाद सरवन्ती बाई ने न सिर्फ बचत प्रारंभ की, बल्कि आजीविका का एक और साधन भी खोज लिया। उन्होने मचान बनाकर जैविक खेती शुरू की। सात फीट लंबे 52 खंभों को बांधकर मचान बनाया और इसके नीचे एक फीट गहरा गड्ढा एक फीट चौड़ा गड्ढा खोदकर बेल वाली फसल लगाई। हर गड्ढे में वर्मी कम्पोज़्ड खाद और गोबर खाद डाली, इसके बाद टाइकोडर्मा से उपचारित कर एक दो बीज डाले। समय समय पर इनकी निदाई-गुड़ाई कर नीमकांठा, गौमूत्र, अग्निअस्त्र डाला। साथ ही हर 15 दिन में मटका खाद, जैविक खाद और जीवामृत भी डाला। कुछ समय बाद बेल बढ़ने पर मचान पर चढ़ा दी। मचान पर बेल अच्छे से फैल जाती है और फल तोड़ने में आसानी रहती है, इस प्रकार करीब पांच डेसीमल जमीन खेती में सेम, बरबटी, लौकी, करेला, गिलकी आदि फसल लगाकर सरवन्ती तेकाम एक सीजन में आठ से दस हजार रूपये कमा रही हैं।

कोकून की माला और झालर का व्यवसाय

कोकून की माला और झालर का व्यवसाय
मंडला के कजरवाड़ा गांव में नारीशक्ति स्वसहायता समूह एवं श्रीगणेश स्व सहायता समूह द्वारा महिलाओं को कोकून की माला एवं झालर बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। इसके पश्चात दोनों समूहों की महिलाओं ने स्थानीय स्तर पर मेले आदि में माला और झालर बेचने का निर्णय लिया। महिलाओं ने दीप मेला मंडला, उत्सव मेला भोपाल तथा होटल क्लब महिन्द्रा से संपर्क कर माला बेचने की बात की। सभी जगहों पर इन्होने 60 रूपये, 80 रूपये तथा 100 रूपये की दर से अलग अलग तरह की माला व झालर बनाकर इनका विक्रय किया। अब तक ये महिलाएं कोकून मालाओं के व्यवसाय से करीब 12 हजार रूपये का मुनाफा कमा चुकी हैं।

गांव में फैला उजियारा

गांव में फैला उजियारा
बालाघाट जिले के सालेटेकरी लांजी रोड पर मछुरदा ग्राम पंचायत पहले काले पानी के रूप में कुख्यात थी। किसी कर्मचारी को अगर सजा देनी होती थी तो उसका तबादला इस ग्राम पंचायत में कर दिया जाता था, क्योंकि यहां पानी की समस्या के साथ ही बिजली की भी समस्या थी। यहां मुख्य रूप से बैगा और गोड़ जनजाति की बसाहट है जो काफी मेहनती है लेकिन समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए काफी प्रयास किए जाने बाकि थे। यहां तेजस्विनी कार्यक्रम लागू होने के बाद से स्थानीय लोगों को काफी लाभ हुआ है। मछुरदा गांव की रहने वाली संगीता वाहने महिला मोबलाइज़र हैं, शुरू शुरू में इन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। यहां गांवों की दूरी बहुत अधिक है, बीच में जंगल पड़ते हैं जहां जानवरों का भय रहता है। बावजूद इसके संगीता वाहने ने महिलाओं को आपस में जोड़ा और बचत तथा आजीविका के अन्य साधनों के बारे में जानकारी दी। ग्रामीणों को शासकीय योजना के अंतर्गत खाद्य वितरण प्रणाली के अंतर्गत अन्त्योदय कार्ड तो मिला था लेकिन जब ये राशन लेने जाते हैं तो इन्हें काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता। ग्राम स्तरीय बैठक में लोगों ने अपनी कई परेशानियां रखी, जिसके बाद ग्रामीणों ने कलेक्टर से मिलने का निर्णय लिया। कलेक्टर के सामने इन्होने अपनी परेशानियां रखी और आवेदन सौंपा। जिसके बाद अधिकारियों ने इनके इलाके में सौर ऊर्जा से सभी घरों में विद्युत व्यवस्था कर दी। आज गांव में इन सबके घर बिजली से जगमगा रहे हैं।

गांव में खुला हाट बाज़ार

गांव में खुला हाट बाज़ार
छतरपुर जिले के सलैया गांव में और आसपास कोई हाट बाजार नहीं था, इस कारण ग्रामीणों को सामान खरीदने करीब 10 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। इस कारण जहां आने जाने के लिए 20 रूपये किराए में खर्च हो जाते, वहीं इनका काफी समय भी बर्बाद होता। यहां गठित बमीठा लक्ष्मीबाई दर्शना तेजस्विनी स्व सहायता समूह की महिलाओं ने ग्राम स्तरीय बैठक में इस बात को उठाया। चर्चा में सप्ताह में दो दिन गांव में हाट बाजार लगाने का प्रस्ताव रखा गया, जिसे सर्वसम्मति से पारित किया गया। प्रस्ताव पर पंचायत सचिव ने सभी के हस्ताक्षर करवाए और इसे जनपद पंचायत को अनुमोदन के लिए भेजा गया। अनुमोदन मिलने पर तेजस्विनी परियोजना एवं ग्राम पंचायत सलैया के संयुक्त प्रयास से 12 जनवरी 2016 से सलैया गांव में हाट बाजार लगना प्रारंभ हो गया है। गांव में ही हाट बाजार लगने से जहां लोगों को सुविधा हुई है, वहीं समूह के सदस्यों सहित गांव के अन्य लोगों को रोजगार भी मिला है।

मनिहारी दुकान बनी आजीविक का जरिया

मनिहारी दुकान बनी आजीविक का जरिया
पन्ना जिले के पड़रियाकलां गांव में रहने वाली मालती लखेरा की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी। मालती, ज्ञान एकता तेजस्विनी महिला स्व सहायता समूह की सदस्या थी और उन्होने समूह से एक हजार रूपये का लोन लिया। इस राशि से उन्होने मनिहारी दुकान खोली और एक माह में ही उन्हें इतनी आमदनी हो गई कि उन्होने ऋण वापस भी कर दिया। अगली बैठक में मालती ने फिर 5 हजार का ऋण लिया और दुकान बढ़ाने के साथ सिलाई मशीन भी खरीद ली। अब मालती प्रतिदिन 150 से 250 रूपये तक अर्जित कर लेती हैं। काम में उनके पति भी सहयोग करते हैं और अब नियमित आय होने से परिवार की आर्थिक स्थिति काफी सुधर गई है।

आलू की खेती से मुनाफा

आलू की खेती से मुनाफा
बालाघाट जिले के कटंगा गांव में 80 प्रतिशत महिलाएं साग-सब्जी के उत्पादन से जुड़ी हैं। कुछ महिलाएं गन्ने की खेती भी करती है, और गुड़ का उत्पादन कर बाजार में बेचती हैं। वनांचल सखी तेजस्विनी महासंघ द्वारा गांव में आजीविका के विकल्पों पर प्रशिक्षण देने के बाद 14 महिलाओं ने आलू की खेती करने का निर्णय लिया। इसके बाद संघ ने उद्यानिकी विभाग से इन महिलाओं को तकनीकी सहयोग व प्रशिक्षण दिलवाया। महिलाओं ने गांव में पानी की उपलब्धता वाली जमीन ठेके पर ली और 200 रूपये में डेढ़ क्विंटल आलू के बीज खरीदकर उसे 8 दिन अंकुरित करने के लिए छोड़ दिया। जमीन को ट्रेक्टर से जोता गया और आठ दस दिन बाद क्यारियां बनाकर उनमें अंकुरित आलू की बुवाई कर दी गई। 15 दिन तक सिंचाई के बाद इनके पौधे बढ़ गए, और करीब 2 महीने में आलू की फसल तैयार हो गई। सभी महिलाओं ने मिलकर खुदाई कर आलू निकाले। इन्होने करीब 7 क्विंटल आलू उगाए, जिसे सभी महिलाओं ने आपस में बराबर बांट लिया। महिलाओं ने अपने घर में साल भर के लिए आलू रखने के बाद बचे हुए आलूओं को 10 रूपये किलो की दर से गांव में बेच दिया, जिससे इन्हें अच्छा मुनाफा हुआ।

किराने की दुकान से आजीविका अर्जन

किराने की दुकान से आजीविका अर्जन
पन्ना जिले के गभौरा गांव में रहने वाली शांतिबाई का परिवार बेहद गरीब था। पूजा तेजस्विनी महिला स्वसहायता समूह से जुड़ने से पहले शांतिबाई और उनके पति मजदूरी कर जीवन चलाते थे। आर्थिक अभाव के कारण इनके बच्चे स्कूल भी नहीं जाते थे। समूह से जुड़ने के बाद शांतिबाई ने समूह की बचत से ऋण लिया और अपने घर में छोटी सी किराने की दुकान खोली, जहां वो रोजमर्रा की वस्तुओं के साथ पान भी बेचने लगी। इस दुकान से स्थिति थोड़ी सुधरी तो शांतिबाई ने संघमित्रा से 16 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर के हिसाब से 10 हजार रूपये का लोन लिया। अब वो गांव के नजदीकी हाट बाजार से दुकान के लिए सामान खरीदकर लाती हैं, वे दुकान में दैनिक उपयोग की वस्तुएं, कोल्डड्रिंक्स, चाय तथा पान का विक्रय करती हैं। दुकान खुलने के बाद इनकी आमदनी प्रतिमाह 5 हजार से 6 हजार तक हो गई है। इन्होने संघमित्रा से लिया ऋण भी चुका दिया है तथा अगले ऋण के लिए आवेदन किया है। अब शांतिबाई का मध्यांचल ग्रामीण बैंक में स्वयं का बचत खाता भी है। इनके बच्चे अब स्कूल जाते हैं और इन्होने स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत अपने घर में शौचालय बनाने के लिए आवेदन भी किया है।

मुर्गीपालन से आर्थिक स्थिति में परिवर्तन

मुर्गीपालन से आर्थिक स्थिति में परिवर्तन
सफलता की यह कहानी पन्ना जिले के जिगनी बल्दूपुरवा गांव की की है I ये एक महिला किसान हैं और एकता तेजस्विनी महिला स्व सहायता समूह की सदस्या हैं। समूह से जुड़ने से पूर्व इनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। समूह से जुड़ने के बाद इन्होने कुछ और आजीविका करने के बारे में सोचा और समूह के सामने इस बात को रखा। इसके बाद समूह की सहायता से सुशीला लोध ने संघमित्रा फायनेंस से 50 हजार का ऋण लिया। अपनी बचत से 25 हजार और मिलाकर इन्होने कुल 75 हजार राशि से बड़े स्तर पर मुर्गीपालन का कार्य शुरू किया। इन्होने 25 हजार रूपये से शेड बनवाया, 50 हजार से 500 चूजे, दवा, दाना, डिब्बे आदि में व्यय किए। पहली बार 35 चूजे मर गए किन्तु फिर भी सुशीला लोधी को इस व्यवसाय में 5 हजार रूपये का लाभ हुआ। इसके बाद इन्होने दोबारा 500 चूजे खरीदे, दूसरी बार इन्हें एक महीने करीब 9 हजार रूपये का लाभ हुआ। वर्तमान में सुशीला लोधी के पास 900 चूजे हैंI इन्होने मुर्गियों की संख्या को देखते हुए एक और नया शेड बना लिया है और अब ये दोगुने लाभ की उम्मीद कर रही हैं। संघमित्रा संस्था से लिया हुआ ऋण भी ये लौटाती जा रही हैं I

भैंसपालन से बदली घर की तस्वीर

भैंसपालन से बदली घर की तस्वीर
पन्ना जिले के निजामपुर गांव में रहने वाली खेमरानी किसान परिवार से ताल्लुक रखती हैं। ये खेती में अपने पति का हाथ बंटाती हैं, इनके पास करीब 2 एकड़ सिंचित जमीन है जिसमें आधुनिक तकनीक से खेती कर इन्हें साल भर में करीब 30 हजार की आय हो जाती थी। ज्ञानदेवी तेजस्विनी महिला स्व सहायता समूह से जुड़ने के बाद खेमरानी ने अपनी आय बढ़ाने के बारे में सोचा। उन्होने समूह से ऋण लेकर भैंस पालन करने की इच्छा जताई। समूह की कुल बचत 19199 रूपये है I फेडरेशन के सहयोग से समूह सदस्यों को संघमित्रा फायनेंस द्वारा 40 हजार रूपये का ऋण प्रदाय किया गया। 20 हजार रूपये खेमरानी तथा 20 हजार अन्य सदस्यों को 16 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर पर ऋण दिया गया। खेमरानी ने 20 हजार ऋण राशि तथा 15 हजार रूपये अपनी बचत से मिलाकर 35 हजार की भैंस खरीदी। खेमरानी और उनके पति को कार्यक्रम के अंतर्गत पशुपालन विभाग की ओर से प्रशिक्षण भी प्रदान किया गया। इनकी भैंस एक दिन में 6 से 8 लीटर दूध देती है, जिसे खेमरानी 30 रूपये प्रति लीटर की दर से विक्रय कर देती हैं। इसके अलावा घी बनाकर 500 रूपये प्रति किलो के हिसाब से बेचने पर उनकी आमदनी में और इज़ाफा हुआ है। पहले जहां खेमरानी के परिवार की वार्षिक आय 30 हजार रूपये थी, वहीँ अब बढ़कर करीब 52 हजार रूपये हो गई है, जिससे उन्होने एक और भैंस खरीद ली है जिससे इनकी आय में और बढ़त हो रही है। अब खेमरानी का बैंक में स्वयं का बचत खाता है और वो अपने घर में शौचालय निर्माण भी कराने वाली हैं।